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UPPCS · 6871 questions

Practice these
Q1221.2021GS2General Hindi

'आजीवन' में समास है

Q1222.2021GS2General Hindi

'जिजीविषा' का अर्थ है

Q1223.2021GS2General Hindi

'उसने नहाकर भोजन किया' - वाक्य में 'नहाकर' किस क्रिया का उदाहरण है?

Q1224.2021GS2General Hindi

'बहती गंगा में हाथ धोना'- मुहावरे का सही अर्थ है

Q1225.2021GS2General Hindi

'गमन' शब्द को विपरीतार्थक बनाने के लिए इनमें से किस उपसर्ग का प्रयोग शुद्ध है?

Q1226.2021GS2General Hindi

शब्द चयन की दृष्टि से इनमें एक शुद्ध वाक्य है

Q1227.2021GS2General Hindi

'स्वार्थ' में निम्नलिखित में से कौन-सा संधि है?

Q1228.2021GS2General Hindi

महत्वपूर्ण कृति 'कृष्णायन' उत्तर प्रदेश की बोलियों में से किस बोली में लिखी गयी?

Q1229.2021GS2General Hindi

निम्नलिखित में से सही युग्म चुनिए।

Q1230.2021GS2General Hindi

'अज' का अर्थ नहीं है।

Q1231.2021GS2General Hindi

निम्नलिखित में 'देवता' का पर्यायवाची शब्द है।

Q1232.2021GS2General Hindi

'हो सकता है वह आया हो' - वाक्य है

Q1233.2021GS2General Hindi

निम्नलिखित में से शुद्ध वर्तनी वाला शब्द है

Q1234.2021GS2General Hindi

हिन्दी शब्दकोश में 'क्ष' का क्रम इनमें से किस वर्ण के बाद में आता है?

Q1235.2021GS2General Hindi

निम्नलिखित में तत्सम-तद्भव का शुद्ध युग्म है

Q1236.2021GS2General Hindi

निम्नलिखित में से किस शब्द में एकाधिक उपसर्गों का प्रयोग हुआ है?

Q1237.2021GS2General Hindi

[प्रश्न संख्या 87 से 91 के लिए: अधोलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा प्रश्न 87 से 91 के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर दीजिए।] [गद्यांश: प्रकृति ने मानव जीवन को बहुत सरल बनाया है, किन्तु आज का मानव अपने जीवन-काल में ही पूरी दुनिया की सुख-समृद्धि बटोर लेने के प्रयास में उसको जटिल बनाता जा रहा है। इस जटिलता के कारण संसार में धनी-निर्धन, सत्ताधीश-सत्ताच्युत, संतानवान-निस्संतान सभी सुख-शांति की चाह तो रखते हैं, किन्तु राह पकड़ते हैं आह भरने की, मरु-मरीचिका के मैदान में जल की, धधकती आग में शीतलता की चाह रखते हैं, विद्वानों का विचार है कि संसार में सुख का मार्ग है- आत्मसंयम। किन्तु मानव इस मार्ग को भूलकर सांसारिक पदार्थों में, इन्द्रिय विषयों की प्राप्ति में आनन्द ढूँढ़ रहा है। परिणामतः दुःख के सागर में डूबता जा रहा है। आत्मसंयम का मार्ग अपने में बहुत स्पष्ट है, उसकी उपादेयता किसी भी काल में कम नहीं होती। इन्द्रिय विषयों का संयम ही आत्मसंयम है भौतिक पदार्थों के प्रति इन्द्रियों का प्रबल आकर्षण मानवीय दुःखों का मूल कारण माना गया है। उपभोक्तावादी संस्कृति के फैलाव से यह आकर्षण तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है। पर ऐसी स्थिति में याद रखना आवश्यक है कि ये भौतिक पदार्थ सुख तो दे सकते हैं, आनन्द नहीं। आनन्द का निर्झर तो आत्मसंयम से फूटता है। उसकी मिठास अनिर्वचनीय और अनुपम होती है। इस मिठास के सम्मुख धन-संपत्ति, सत्ता, सौंदर्य का सुख, सागर के खारे पानी जैसा लगने लगता है।] आत्मसंयम का तात्पर्य है

Q1238.2021GS2General Hindi

[प्रश्न संख्या 87 से 91 के लिए: अधोलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा प्रश्न 87 से 91 के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर दीजिए।] [गद्यांश: प्रकृति ने मानव जीवन को बहुत सरल बनाया है, किन्तु आज का मानव अपने जीवन-काल में ही पूरी दुनिया की सुख-समृद्धि बटोर लेने के प्रयास में उसको जटिल बनाता जा रहा है। इस जटिलता के कारण संसार में धनी-निर्धन, सत्ताधीश-सत्ताच्युत, संतानवान-निस्संतान सभी सुख-शांति की चाह तो रखते हैं, किन्तु राह पकड़ते हैं आह भरने की, मरु-मरीचिका के मैदान में जल की, धधकती आग में शीतलता की चाह रखते हैं, विद्वानों का विचार है कि संसार में सुख का मार्ग है- आत्मसंयम। किन्तु मानव इस मार्ग को भूलकर सांसारिक पदार्थों में, इन्द्रिय विषयों की प्राप्ति में आनन्द ढूँढ़ रहा है। परिणामतः दुःख के सागर में डूबता जा रहा है। आत्मसंयम का मार्ग अपने में बहुत स्पष्ट है, उसकी उपादेयता किसी भी काल में कम नहीं होती। इन्द्रिय विषयों का संयम ही आत्मसंयम है भौतिक पदार्थों के प्रति इन्द्रियों का प्रबल आकर्षण मानवीय दुःखों का मूल कारण माना गया है। उपभोक्तावादी संस्कृति के फैलाव से यह आकर्षण तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है। पर ऐसी स्थिति में याद रखना आवश्यक है कि ये भौतिक पदार्थ सुख तो दे सकते हैं, आनन्द नहीं। आनन्द का निर्झर तो आत्मसंयम से फूटता है। उसकी मिठास अनिर्वचनीय और अनुपम होती है। इस मिठास के सम्मुख धन-संपत्ति, सत्ता, सौंदर्य का सुख, सागर के खारे पानी जैसा लगने लगता है।] सत्ताच्युत का सही वर्तनी विश्लेषण है

Q1239.2021GS2General Hindi

[प्रश्न संख्या 87 से 91 के लिए: अधोलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा प्रश्न 87 से 91 के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर दीजिए।] [गद्यांश: प्रकृति ने मानव जीवन को बहुत सरल बनाया है, किन्तु आज का मानव अपने जीवन-काल में ही पूरी दुनिया की सुख-समृद्धि बटोर लेने के प्रयास में उसको जटिल बनाता जा रहा है। इस जटिलता के कारण संसार में धनी-निर्धन, सत्ताधीश-सत्ताच्युत, संतानवान-निस्संतान सभी सुख-शांति की चाह तो रखते हैं, किन्तु राह पकड़ते हैं आह भरने की, मरु-मरीचिका के मैदान में जल की, धधकती आग में शीतलता की चाह रखते हैं, विद्वानों का विचार है कि संसार में सुख का मार्ग है- आत्मसंयम। किन्तु मानव इस मार्ग को भूलकर सांसारिक पदार्थों में, इन्द्रिय विषयों की प्राप्ति में आनन्द ढूँढ़ रहा है। परिणामतः दुःख के सागर में डूबता जा रहा है। आत्मसंयम का मार्ग अपने में बहुत स्पष्ट है, उसकी उपादेयता किसी भी काल में कम नहीं होती। इन्द्रिय विषयों का संयम ही आत्मसंयम है भौतिक पदार्थों के प्रति इन्द्रियों का प्रबल आकर्षण मानवीय दुःखों का मूल कारण माना गया है। उपभोक्तावादी संस्कृति के फैलाव से यह आकर्षण तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है। पर ऐसी स्थिति में याद रखना आवश्यक है कि ये भौतिक पदार्थ सुख तो दे सकते हैं, आनन्द नहीं। आनन्द का निर्झर तो आत्मसंयम से फूटता है। उसकी मिठास अनिर्वचनीय और अनुपम होती है। इस मिठास के सम्मुख धन-संपत्ति, सत्ता, सौंदर्य का सुख, सागर के खारे पानी जैसा लगने लगता है।] आज का मानव जीवन को अधिक जटिल कैसे बना रहा है?

Q1240.2021GS2General Hindi

[प्रश्न संख्या 87 से 91 के लिए: अधोलिखित गद्यांश को ध्यान से पढ़िए तथा प्रश्न 87 से 91 के उत्तर इस गद्यांश के आधार पर दीजिए।] [गद्यांश: प्रकृति ने मानव जीवन को बहुत सरल बनाया है, किन्तु आज का मानव अपने जीवन-काल में ही पूरी दुनिया की सुख-समृद्धि बटोर लेने के प्रयास में उसको जटिल बनाता जा रहा है। इस जटिलता के कारण संसार में धनी-निर्धन, सत्ताधीश-सत्ताच्युत, संतानवान-निस्संतान सभी सुख-शांति की चाह तो रखते हैं, किन्तु राह पकड़ते हैं आह भरने की, मरु-मरीचिका के मैदान में जल की, धधकती आग में शीतलता की चाह रखते हैं, विद्वानों का विचार है कि संसार में सुख का मार्ग है- आत्मसंयम। किन्तु मानव इस मार्ग को भूलकर सांसारिक पदार्थों में, इन्द्रिय विषयों की प्राप्ति में आनन्द ढूँढ़ रहा है। परिणामतः दुःख के सागर में डूबता जा रहा है। आत्मसंयम का मार्ग अपने में बहुत स्पष्ट है, उसकी उपादेयता किसी भी काल में कम नहीं होती। इन्द्रिय विषयों का संयम ही आत्मसंयम है भौतिक पदार्थों के प्रति इन्द्रियों का प्रबल आकर्षण मानवीय दुःखों का मूल कारण माना गया है। उपभोक्तावादी संस्कृति के फैलाव से यह आकर्षण तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा है। पर ऐसी स्थिति में याद रखना आवश्यक है कि ये भौतिक पदार्थ सुख तो दे सकते हैं, आनन्द नहीं। आनन्द का निर्झर तो आत्मसंयम से फूटता है। उसकी मिठास अनिर्वचनीय और अनुपम होती है। इस मिठास के सम्मुख धन-संपत्ति, सत्ता, सौंदर्य का सुख, सागर के खारे पानी जैसा लगने लगता है।] गद्यांश के अनुसार भौतिक पदार्थ

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